श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.261.6 
न मया सदृशोऽस्तीह लोके स्थावरजङ्गमे।
अप्सु वैहायसं गच्छेन्मया योऽन्य: सहेति वै॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मेरे सिवा इस संसार में कोई दूसरा मनुष्य नहीं है जो मेरे साथ जल में चलने और आकाश में विचरण करने की शक्ति रखता हो ॥6॥
 
Apart from me there is no other human being in this world who has the power to move along with me in water and roam in the sky. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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