|
| |
| |
श्लोक 12.261.51  |
खे वाचं त्वमथाश्रौषीर्मां प्रति द्विजसत्तम।
अमर्षवशमापन्नस्तत: प्राप्तो भवानिह।
करवाणि प्रियं किं ते तद् ब्रूहि द्विजसत्तम॥ ५१॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! उस समय मेरे विषय में आकाशवाणी हुई, जिसे सुनकर आप क्रोधित होकर मेरे पास आए। हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप मुझे बताइए कि मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?॥ 51॥ |
| |
| O best Brahmin! At that time, a voice from the sky was heard about me, which you heard and on hearing it, you came to me out of anger. O great Brahmin! Tell me, which of your favourite tasks should I do?॥ 51॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि तुलाधारजाजलिसंवादे एकषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तुलाधार-जाजलि-संवादविषयक दो सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६१॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|