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mahabharat 12.261.5: समुद्रपर्यन्त वन-वनसहित पृथ्वी का अवलोकन करके तथा समुद्रतट के निकट की आर्द्रभूमि में निवास करके एक बार जाजलि ऋषि इस प्रकार चिन्तन करने लगे ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.261.5 
स चिन्तयामास मुनिर्जलवासे कदाचन।
विप्रेक्ष्य सागरान्तां वै महीं सवनकाननाम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
समुद्रपर्यन्त वन-वनसहित पृथ्वी का अवलोकन करके तथा समुद्रतट के निकट की आर्द्रभूमि में निवास करके एक बार जाजलि ऋषि इस प्रकार चिन्तन करने लगे ॥5॥
 
Having observed the earth including the forests and jungles up to the sea and residing in the wetland near the sea-shore, the sage Jajali once began to contemplate thus. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)