श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.261.47 
तुलाधार उवाच
आयानेवासि विदितो मम ब्रह्मन् न संशय:।
ब्रवीमि यत् तु वचनं तच्छृणुष्व द्विजोत्तम॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
तुलाधार ने कहा, "ब्राह्मण! मैं पहले से ही जानता था कि तुम मेरे पास आ रहे हो, इसमें कोई संदेह नहीं है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अब मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।" 47.
 
Tuladhar said, "Brahmin! I already knew that you are coming to me, there is no doubt about it. O best of Brahmins! Now listen carefully to whatever I say." 47.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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