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mahabharat 12.261.42-43: तभी आकाशवाणी हुई - 'जाजलि! तुम धर्म में तुलाधार के समान नहीं हो। काशीपुरी में एक परम ज्ञानी तुलाधार वैश्य रहता है। ब्राह्मण! वह तुलाधार भी ऐसी बात नहीं कह सकता, जैसी तुम कह रहे हो।' जाजलि ने आकाशवाणी सुनी। 42-43।   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  12.261.42-43 
अथान्तरिक्षे वागासीत् तां च शुश्राव जाजलि:।
धर्मेण न समस्त्वं वै तुलाधारस्य जाजले॥ ४२॥
वाराणस्यां महाप्राज्ञस्तुलाधार: प्रतिष्ठित:।
सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं भाषसे द्विज॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
तभी आकाशवाणी हुई - 'जाजलि! तुम धर्म में तुलाधार के समान नहीं हो। काशीपुरी में एक परम ज्ञानी तुलाधार वैश्य रहता है। ब्राह्मण! वह तुलाधार भी ऐसी बात नहीं कह सकता, जैसी तुम कह रहे हो।' जाजलि ने आकाशवाणी सुनी। 42-43।
 
Just then a voice from the sky was heard - 'Jajali! You are not equal to Tuladhar in religion, in Kashipuri there is a highly knowledgeable Tuladhar Vaishya. Brahmin! Even that Tuladhar cannot say such a thing as you are saying.' Jajali heard that voice from the sky. 42-43.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)