श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.261.38 
ततस्तेषु प्रलीनेषु जाजलिर्जातविस्मय:।
सिद्धोऽस्मीति मतिं चक्रे ततस्तं मान आविशत् ॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जब पक्षी अदृश्य हो गए, तब जाजलि को बड़ा आश्चर्य हुआ । उसे अपने पर विश्वास होने लगा कि मुझे सफलता मिल गई है । तब उसे बड़ा अभिमान हो गया ॥38॥
 
When the birds became invisible, Jaajali was very surprised. He started believing in himself that he has achieved success. Then he became very arrogant. ॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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