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श्लोक 12.261.37  |
कदाचिन्मासमात्रेण समुत्पत्य विहङ्गमा:।
नैवागच्छंस्ततो राजन् प्रातिष्ठत स जाजलि:॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| राजन ! एक बार वे पक्षी उड़कर एक महीने तक नहीं लौटे। तब जाजलि ऋषि उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र चले गए ॥37॥ |
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| King! Once those flying birds flew away and did not return for a month. Then the sage Jajali left that place and went somewhere else. ॥ 37॥ |
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