श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.261.37 
कदाचिन्मासमात्रेण समुत्पत्य विहङ्गमा:।
नैवागच्छंस्ततो राजन् प्रातिष्ठत स जाजलि:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
राजन ! एक बार वे पक्षी उड़कर एक महीने तक नहीं लौटे। तब जाजलि ऋषि उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र चले गए ॥37॥
 
King! Once those flying birds flew away and did not return for a month. Then the sage Jajali left that place and went somewhere else. ॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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