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mahabharat 12.261.34: हे मनुष्यों के स्वामी! अब वे पक्षी दिन भर चरने के लिए बाहर जाते और शाम को उसी स्थान पर आकर बसेरा करते।   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.261.34 
तथा ते दिवसं चापि गत्वा सायं पुनर्नृप।
उपावर्तन्त तत्रैव निवासार्थं शकुन्तका:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! अब वे पक्षी दिन भर चरने के लिए बाहर जाते और शाम को उसी स्थान पर आकर बसेरा करते।
 
O Lord of men! Now those birds would go out to graze for the whole day and return to the same place in the evening to roost.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)