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mahabharat 12.261.32: बच्चों के पंख उग आए थे, इसलिए वे दिन में भोजन करने के लिए उड़ जाते और हर शाम को लौट आते। महाबली ब्राह्मण जाजलि पक्षियों को आते-जाते देखते, पर हिलते नहीं।   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.261.32 
जातपक्षांश्च सोऽपश्यदुड्डीनान् पुनरागतान्।
सायं सायं द्विजान् विप्रो न चाकम्पत जाजलि:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
बच्चों के पंख उग आए थे, इसलिए वे दिन में भोजन करने के लिए उड़ जाते और हर शाम को लौट आते। महाबली ब्राह्मण जाजलि पक्षियों को आते-जाते देखते, पर हिलते नहीं।
 
The children had grown wings, so they would fly out to eat food during the day and return every evening. The great Brahmin Jajali would see the birds coming and going but would not move.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)