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श्लोक 12.261.30-31  |
तत: कदाचित् तांस्तत्र पश्यन् पक्षीन् यतव्रत:।
बभूव परमप्रीतस्तदा मतिमतां वर:॥ ३०॥
तथा तानपि संवृद्धान् दृष्ट्वा चाप्नुवतां मुदम्।
शकुनौ निर्भयौ तत्र ऊषतुश्चात्मजै: सह॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| एक दिन जाजलि, जो संयमपूर्वक व्रतों का पालन करने में तत्पर रहते थे और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ थे, उन पंखवाले बच्चों को वहाँ उड़ते देखकर बहुत प्रसन्न हुए। अपने बच्चों को बड़ा होते देखकर वे दोनों पक्षी भी बहुत प्रसन्न हुए और अपने बच्चों के साथ निर्भय होकर वहाँ रहने लगे ॥30-31॥ |
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| One day Jajali, who was always ready to observe fasts with restraint and was the best among the wise, was very happy to see those winged children flying there. On seeing their children grow up, both the birds also felt very happy and started living there fearlessly with their children. ॥ 30-31॥ |
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