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mahabharat 12.261.28: वह पुण्यात्मा ऋषि, जो दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन कर रहे थे और एकाग्र थे, पहले की तरह ही स्थिर खड़े होकर उन पक्षियों के अण्डों की रक्षा करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.261.28 
स रक्षमाणस्त्वण्डानि कुलिङ्गानां धृतव्रत:।
तथैव तस्थौ धर्मात्मा निर्विचेष्ट: समाहित:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वह पुण्यात्मा ऋषि, जो दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन कर रहे थे और एकाग्र थे, पहले की तरह ही स्थिर खड़े होकर उन पक्षियों के अण्डों की रक्षा करने लगे।
 
The virtuous sage, who was firmly observing the fast and was focused, stood still as before, protecting the eggs of those birds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)