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mahabharat 12.261.27: जब अंडे पक गए तो उन्हें तोड़ दिया गया और उनमें से बच्चे निकलकर वहीं बड़े हो गए, परंतु जाजलि ऋषि तनिक भी नहीं हिले ॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.261.27 
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्य: प्राजायन्त शकुन्तका:।
व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलि:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जब अंडे पक गए तो उन्हें तोड़ दिया गया और उनमें से बच्चे निकलकर वहीं बड़े हो गए, परंतु जाजलि ऋषि तनिक भी नहीं हिले ॥ 27॥
 
When the eggs were ripe, they were broken and the babies came out and grew up there. But the sage Jajali did not move at all.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)