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mahabharat 12.261.26: हे प्रभु! वे पक्षी-जोड़े प्रतिदिन भोजन करने के लिए बाहर जाते थे और लौटकर उनके सिर पर घोंसला बनाते थे, वहाँ उन्हें बड़ा सुख मिलता था और वे बड़े प्रसन्न होते थे॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.261.26 
अहन्यहनि चागत्य ततस्तौ तस्य मूर्धनि।
आश्वासितौ निवसत: सम्प्रहृष्टौ तदा विभो॥ २६॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! वे पक्षी-जोड़े प्रतिदिन भोजन करने के लिए बाहर जाते थे और लौटकर उनके सिर पर घोंसला बनाते थे, वहाँ उन्हें बड़ा सुख मिलता था और वे बड़े प्रसन्न होते थे॥ 26॥
 
O Lord! Those pairs of birds used to go out every day to eat food and after returning they used to nest on his head, there they used to get great comfort and they used to be very happy.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)