Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.261.25: यह जानकर भी महाबली जाजलि विचलित नहीं हुए, उनका मन सदैव धर्म में ही लगा रहता था, इसलिए उन्हें अधर्म का कार्य अच्छा नहीं लगता था॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.261.25 
बुद्‍ध्वा च स महातेजा न चचाल च जाजलि:।
धर्मे कृतमना नित्यं नाधर्मं स त्वरोचयत् ॥ २५॥
 
 
अनुवाद
यह जानकर भी महाबली जाजलि विचलित नहीं हुए, उनका मन सदैव धर्म में ही लगा रहता था, इसलिए उन्हें अधर्म का कार्य अच्छा नहीं लगता था॥ 25॥
 
Even after knowing this, the mighty Jajali was not perturbed. His mind was always devoted to Dharma; hence he did not like the act of Adharma.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)