श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.261.22 
यदा न स चलत्येव स्थाणुभूतो महातपा:।
ततस्तौ सुखविश्वस्तौ सुखं तत्रोषतुस्तदा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जब वह महातपस्वी काठ के ठूँठ के समान हो गया और तनिक भी हिलता-डुलता नहीं था, तब उस पर पूर्ण विश्वास करके वे दोनों पक्षी वहाँ अत्यंत सुखपूर्वक रहने लगे ॥22॥
 
When that great ascetic became like a stump of wood and did not move at all, then having gained full faith in him, both the birds started living there very happily. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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