श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.261.2 
वने वनचर: कश्चिज्जाजलिर्नाम वै द्विज:।
सागरोद्देशमागम्य तपस्तेपे महातपा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में जाजलि नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण वन में रहते और विचरण करते थे। उस महान तपस्वी जाजलि ने समुद्र के किनारे जाकर घोर तपस्या की।
 
In ancient times there was a famous Brahmin named Jajali, who used to live and roam in the forest. That great ascetic Jajali went to the seashore and performed great penance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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