श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.261.19 
स कदाचिन्निराहारो वायुभक्षो महातपा:।
तस्थौ काष्ठवदव्यग्रो न चचाल च कर्हिचित्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
एक समय की बात है, महातपस्वी जाजलि निराहार और निश्वासित होकर काठ के समान खड़े थे। उस समय उनका मन तनिक भी चंचल नहीं था और वे क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं हुए। ॥19॥
 
Once upon a time, the great ascetic Jajali stood like a piece of wood, without any food and breathing in air. At that time his mind was not at all restless and he did not get disturbed even for a moment. ॥19॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas