श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.261.18 
अथ तस्य जटा: क्लिन्ना बभूवुर्ग्रथिता: प्रभो।
अरण्यगमनान्नित्यं मलिनोऽमलसंयुत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! उनके केश सदैव गीले रहने के कारण उलझकर जटाओं में बदल गए थे। वन में निरन्तर भ्रमण करने के कारण उनका शरीर मैल से भर गया था; परन्तु उनका हृदय निर्मल हो गया था॥18॥
 
O Lord! His hair had become matted and turned into dreadlocks because it was always wet. His body had become covered with dirt due to his constant wandering in the forest; but his heart had become pure.॥18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd