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श्लोक 12.261.17  |
तत: कदाचित् स मुनिर्वर्षास्वाकाशमास्थित:।
अन्तरिक्षाज्जलं मूर्ध्ना प्रत्यगृह्णान्मुहुर्मुहु:॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| तदनन्तर जब वर्षा ऋतु आई, तब ऋषि खुले आकाश के नीचे खड़े होकर आकाश से बार-बार गिरने वाली मूसलाधार वर्षा का आघात अपने सिर पर सहने लगे ॥17॥ |
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| Thereafter, when the rainy season arrived, the sage stood under the open sky and began to bear the impact of the torrential rain falling from the sky on his head again and again. ॥17॥ |
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