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mahabharat 12.261.17: तदनन्तर जब वर्षा ऋतु आई, तब ऋषि खुले आकाश के नीचे खड़े होकर आकाश से बार-बार गिरने वाली मूसलाधार वर्षा का आघात अपने सिर पर सहने लगे ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.261.17 
तत: कदाचित् स मुनिर्वर्षास्वाकाशमास्थित:।
अन्तरिक्षाज्जलं मूर्ध्ना प्रत्यगृह्णान्मुहुर्मुहु:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जब वर्षा ऋतु आई, तब ऋषि खुले आकाश के नीचे खड़े होकर आकाश से बार-बार गिरने वाली मूसलाधार वर्षा का आघात अपने सिर पर सहने लगे ॥17॥
 
Thereafter, when the rainy season arrived, the sage stood under the open sky and began to bear the impact of the torrential rain falling from the sky on his head again and again. ॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)