श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.261.15-16 
वने तपस्यतिष्ठत् स न च धर्ममवैक्षत।
वर्षास्वाकाशशायी च हेमन्ते जलसंश्रय:॥ १५॥
वातातपसहो ग्रीष्मे न च धर्ममविन्दत।
दु:खशय्याश्च विविधा भूमौ च परिवर्तते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वे वन में रहकर तपस्या में लीन रहे, परन्तु कभी भी अपने धर्म की उपेक्षा नहीं की । वर्षा ऋतु में वे खुले आकाश के नीचे सोते और शीत ऋतु में जल के नीचे बैठते । इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु में उन्होंने भीषण गर्मी और लू के थपेड़े भी सहन किए; परन्तु उन्हें सच्चे धर्म का ज्ञान नहीं हुआ । वे भूमि पर लोटते और नाना प्रकार से सोते थे, जिससे उन्हें और भी अधिक दुःख और पीड़ा होती थी ॥16॥
 
He lived in the forest and remained engaged in penance, but never neglected his religion. He used to sleep under the open sky during the rainy season and sit under water during the winter season. Similarly, he endured the scorching heat and heat waves during the summer months; but he did not get the knowledge of true religion. He used to roll on the ground and sleep in various ways, which only caused him more pain and suffering.॥16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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