श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  12.261.13-14 
भीष्म उवाच
अतीव तपसा युक्तो घोरेण स बभूव ह।
तथोपस्पर्शनरत: सायं प्रातर्महातपा:॥ १३॥
अग्नीन् परिचरन् सम्यक् स्वाध्यायपरमो द्विज:।
वानप्रस्थविधानज्ञो जाजलिर्ज्वलित: श्रिया॥ १४॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - बेटा ! जाजलि मुनि बड़े तपस्वी थे और अत्यन्त घोर तपस्या में लीन रहते थे । वे प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल स्नान और संध्यावंदन के पश्चात विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते थे और सदैव वेदों के स्वाध्याय में लगे रहते थे । ब्रह्मर्षि जाजलि वानप्रस्थ धर्म की विधि को जानने वाले और उसका पालन करने वाले थे, वे अपने तेज से प्रज्वलित हो रहे थे ॥13-14॥
 
Bhishmaji said – Son! Jajali Muni was a great ascetic and was engaged in extremely severe penance. He used to perform Agnihotra ritually after taking bath and evening worship every evening and morning and was always engaged in self-study of the Vedas. Brahmarshi Jajali was the one who knew and followed the method of religion of Vanaprastha, he was blazing with his brilliance. 13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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