श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.261.11 
इत्युक्तो जाजलिर्भूतैर्जगाम विमनास्तदा।
वाराणस्यां तुलाधारं समासाद्याब्रवीदिदम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उन अदृश्य भूतों को ऐसा कहते सुनकर जाजलि ऋषि दुःखी होकर काशी चले गए और वहाँ पहुँचकर तुलाधार से इस प्रकार बोले ॥11॥
 
On hearing these invisible ghosts say this, sage Jajali became sad and went to Kashi and on reaching Tuladhar spoke to him as follows. ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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