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mahabharat 12.26.31: ‘प्राप्त धन का उपयोग करते समय दो प्रकार की गलतियाँ होती हैं, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए। पहली गलती है, अयोग्य व्यक्ति को धन देना और दूसरी है, पात्र व्यक्ति को धन न देना।’॥31॥   |   mahabharat अध्याय 12.26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.26.31 
लब्धानामपि वित्तानां बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ।
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
‘प्राप्त धन का उपयोग करते समय दो प्रकार की गलतियाँ होती हैं, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए। पहली गलती है, अयोग्य व्यक्ति को धन देना और दूसरी है, पात्र व्यक्ति को धन न देना।’॥31॥
 
‘There are two kinds of mistakes that are made while using the money that one receives, which should be kept in mind. The first mistake is giving money to an unworthy person and the second is not giving money to a deserving person.’॥ 31॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये षड्‍‍विंशोऽध्याय:॥ २६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका वाक्यविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)