श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.26.28 
लब्धस्य त्यागमित्याहुर्न भोगं न च संचयम्।
तस्य किं संचयेनार्थ: कार्ये ज्यायसि तिष्ठति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘अपने कमाए हुए धन का दान करना उचित है। उसे भोग-विलास में लगाना या संग्रह करना उचित नहीं है। जिसके पास यज्ञ आदि महान् कार्य हों, उसे संग्रह करने की क्या आवश्यकता है?॥28॥
 
‘It is right to donate the money that one has earned. It is not right to use it for enjoyment or to hoard it. What is the need for someone who has a big task like Yagna etc. to hoard money?॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)