श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.26.27 
तस्माद्‍बुद्धॺन्ति पुरुषा न हि तत् कस्यचिद् ध्रुवम्।
श्रद्दधानस्ततो लोको दद्याच्चैव यजेत च॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इसीलिए बुद्धिमान पुरुष यह समझते हैं कि धन एक व्यक्ति के पास नहीं रहता; इसलिए धर्मात्मा पुरुष को चाहिए कि वह धन दान कर दे और यज्ञों में लगा दे॥ 27॥
 
'That is why wise men understand that wealth never stays with one person; therefore a devout person should donate that wealth and use it in sacrifices.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)