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mahabharat 12.26.25: विधाता ने धन की रचना केवल यज्ञ के लिए की है और मनुष्य को यज्ञ के लिए उसकी रक्षा करने के लिए उत्पन्न किया है। अतः समस्त धन का उपयोग यज्ञ के लिए ही करना चाहिए। धन का भोग-विलास में उपयोग न तो लाभदायक है और न ही कल्याणकारी। 25॥   |   mahabharat अध्याय 12.26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.26.25 
यज्ञाय सृष्टानि धनानि धात्रा
यज्ञाय सृष्ट: पुरुषो रक्षिता च।
तस्मात् सर्वं यज्ञ एवोपयोज्यं
धनं न कामाय हितं प्रशस्तम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
विधाता ने धन की रचना केवल यज्ञ के लिए की है और मनुष्य को यज्ञ के लिए उसकी रक्षा करने के लिए उत्पन्न किया है। अतः समस्त धन का उपयोग यज्ञ के लिए ही करना चाहिए। धन का भोग-विलास में उपयोग न तो लाभदायक है और न ही कल्याणकारी। 25॥
 
‘The Creator has created wealth only for the Yagya and has created man to protect it for the Yagya. Therefore, all the money should be used only for yagya. Using money for enjoyment is neither beneficial nor good. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)