Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.26.22: जब नौकरों को समय पर वेतन मिलने पर भी वे संतुष्ट नहीं होते, तो वे अपने स्वामी से अप्रसन्न रहते हैं और यदि कोई धनवान व्यक्ति दुर्लभ धन पाकर भी नौकरों को अधिक दे देता है, तो उसे उतना ही दुःख होता है, जितना उसे चोरों और लुटेरों के भय से होता है।   |   mahabharat अध्याय 12.26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.26.22 
दुष्यन्त्याददतो भृत्या नित्यं दस्युभयादिव।
दुर्लभं च धनं प्राप्य भृशं दत्त्वानुतप्यते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जब नौकरों को समय पर वेतन मिलने पर भी वे संतुष्ट नहीं होते, तो वे अपने स्वामी से अप्रसन्न रहते हैं और यदि कोई धनवान व्यक्ति दुर्लभ धन पाकर भी नौकरों को अधिक दे देता है, तो उसे उतना ही दुःख होता है, जितना उसे चोरों और लुटेरों के भय से होता है।
 
When servants are not satisfied despite getting their wages on time, they remain unhappy with their master. And if a rich man, after getting rare wealth, gives more to his servants, he feels as much pain as he would feel due to the fear of thieves and robbers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)