श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.26.2 
यदेतन्मन्यसे पार्थ न ज्यायोऽस्ति धनादिति।
न स्वर्गो न सुखं नार्थो निर्धनस्येति तन्मृषा॥ २॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! तुम ऐसा सोचते हो कि धन से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है और दरिद्र मनुष्य स्वर्ग, सुख या धन प्राप्त नहीं कर सकता, यह बात ठीक नहीं है॥2॥
 
'Partha! You think that there is nothing more valuable than wealth and that a poor person cannot attain heaven, happiness or wealth, this is not correct.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)