श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.26.18 
धनहेतोर्य ईहेत तस्यानीहा गरीयसी।
भूयान् दोषो हि वित्तस्य यश्च धर्मस्तदाश्रय:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य धन के लिए प्रयत्नशील रहता है, उसके लिए निष्क्रिय रहना ही अच्छा है, क्योंकि धन और उस पर आश्रित धर्म में महान् दोष दिखाई देता है॥18॥
 
'It is better for a person who strives for wealth to sit idle, because there appears to be a great flaw in wealth and the religion which is dependent on it.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)