श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.26.17 
इदं तु शृणु मे पार्थ ब्रुवत: संयतेन्द्रिय:।
धर्ममन्ये वृत्तमन्ये धनमीहन्ति चापरे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके मेरी बात सुनो। कुछ लोग धर्म के लिए चिन्तित रहते हैं, कुछ लोग सदाचार के लिए चिन्तित रहते हैं और बहुत से लोग धन प्राप्ति के लिए चिन्तित रहते हैं॥ 17॥
 
'Kuntinandan! Listen to what I am saying by controlling all your senses. Some people are concerned about religion, some about good conduct and many others are concerned about acquiring wealth.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)