श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 26: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.26.16 
विनीतमानमोहश्च बहुसङ्गविवर्जित:।
तदाऽऽत्मज्योतिष: साधोर्निर्वाणमुपपद्यते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
“जिस साधु पुरुष का मान और मोह नष्ट हो गया है, जो नाना प्रकार की आसक्तियों से मुक्त है और जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है।”॥16॥
 
“The saintly person whose pride and delusion have been dispelled, who is free from various kinds of attachments and who has attained the knowledge of the Self, attains salvation.”॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)