श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.259.7 
यथा धर्मसमाविष्टो धनं गृह्णाति तस्कर:।
रमते निर्हरन् स्तेन: परवित्तमराजके॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे चोर धर्म-कर्म में लगा हुआ भी दूसरों का धन चुराता है और डाकू जो अस्त-व्यस्त स्थिति में दूसरे का धन चुराता है, वह सुख का अनुभव करता है ॥7॥
 
Just as a thief, even while engaged in religious activities, still steals the wealth of others, and a robber who steals someone else's wealth in a chaotic situation, experiences happiness. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)