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mahabharat 12.259.25: युधिष्ठिर! सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करने से जो प्राप्त होता है, वह धर्म है, ऐसा बुद्धिमान पुरुषों का कथन है और जो इसके विपरीत है, वह अधर्म है। इसे तुम संक्षेप में धर्म और अधर्म का लक्षण समझो॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 12.259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.259.25 
सर्वं प्रियाभ्युपगतं धर्ममाहुर्मनीषिण:।
पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर॥ २५॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करने से जो प्राप्त होता है, वह धर्म है, ऐसा बुद्धिमान पुरुषों का कथन है और जो इसके विपरीत है, वह अधर्म है। इसे तुम संक्षेप में धर्म और अधर्म का लक्षण समझो॥ 25॥
 
Yudhishthira! Whatever is achieved by behaving lovingly with everyone is Dharma, this is the statement of wise men and whatever is contrary to this is Adharma. You should understand this briefly as the characteristic of Dharma and Adharma.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)