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mahabharat 12.259.21: जो मनुष्य स्वयं कायर बनकर दूसरे के घर जाता है और दूसरे की स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, वह जब दूसरे को वैसा ही करते देखता है, तो किससे क्या कह सकता है? यदि वह उसी प्रवृत्ति के कारण दूसरे की निन्दा करता है, तो मेरा मानना ​​है कि वह मनुष्य अपनी निन्दा सहन नहीं कर सकता ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 12.259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.259.21 
योऽन्यस्य स्यादुपपति: स कं किं वक्तुमर्हति।
यदन्यस्य तत: कुर्यान्न मृष्येदिति मे मति:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य स्वयं कायर बनकर दूसरे के घर जाता है और दूसरे की स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, वह जब दूसरे को वैसा ही करते देखता है, तो किससे क्या कह सकता है? यदि वह उसी प्रवृत्ति के कारण दूसरे की निन्दा करता है, तो मेरा मानना ​​है कि वह मनुष्य अपनी निन्दा सहन नहीं कर सकता ॥21॥
 
A man who himself goes to another's house as a coward and commits adultery with another's wife, what can he say to whom when he sees another doing the same thing? If he criticises another for the same tendency, then I believe that the man cannot tolerate his criticism. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)