श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.259.20 
यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मन: कर्म पूरुष:।
न तत् परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मन:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करे जो उसे अपने लिए वांछनीय न लगे। उसे यह जान लेना चाहिए कि जो व्यवहार उसे अप्रिय है, वह दूसरों को भी प्रिय नहीं हो सकता। ॥20॥
 
A person should not behave with others in a way which he does not consider desirable for himself. He should know that the behaviour which is unpleasant for him cannot be liked by others either. ॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)