श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.259.2 
धर्मस्त्वयमिहार्थ: किममुत्रार्थोऽपि वा भवेत्।
उभयार्थो हि वा धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह॥ २॥
 
 
अनुवाद
पितामह! इस लोक में सुख प्राप्ति के लिए किया गया कर्म धर्म है या परलोक के कल्याण के लिए किया गया कर्म धर्म है? अथवा इस लोक और परलोक दोनों के कल्याण के लिए किया गया कर्म धर्म कहलाता है? कृपया मुझे यह बताइए॥2॥
 
Grandfather! Is the action done to attain happiness in this world Dharma or is the action done for welfare in the next world Dharma? Or is the action done for the betterment of both this world and the next called Dharma? Please tell me this.॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)