श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.259.19 
यदा नियतिकार्पण्यमथैषामेव रोचते।
न ह्यत्यन्तं धनवन्तो भवन्ति सुखिनोऽपि वा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
परंतु यदि संयोगवश वे भी दरिद्र हो जाएँ या भिखारी हो जाएँ, तो भी उन्हें यही धर्म श्रेष्ठ जान पड़ता है; क्योंकि न तो कोई कभी अति धनवान होता है और न अति सुखी (अतः धन का अभिमान नहीं करना चाहिए)॥19॥
 
But if by chance they too become poor or become beggars, then even they find this Dharma to be the best; because no one is ever extremely rich or extremely happy (so one should not be proud of one's wealth).॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)