श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.259.17 
मुदित: शुचिरभ्येति सर्वतो निर्भय: सदा।
न हि दुश्चरितं किंचिदात्मनोऽन्येषु पश्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जिसका आचरण और विचार शुद्ध हैं, उसे कहीं से भी कोई चिंता नहीं रहती। वह सदैव सब ओर से प्रसन्न और निर्भय रहता है तथा दूसरों में अपने दुष्कर्मों को नहीं देखता।॥17॥
 
He whose conduct and thoughts are pure, has no worries from anywhere. He always remains happy and fearless from all sides and he does not see his own misdeeds in others.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)