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mahabharat 12.258.40: भयंकर शब्द करने वाला महान, शक्तिशाली और भयानक प्राणवायु ही समस्त प्राणियों का प्राण रूप है। प्राणियों के शरीर नष्ट हो जाने पर वे नाना प्रकार की योनियों या शरीरों को प्राप्त होते हैं। अतः इस शरीर के भीतर देवाधिदेव वायु (प्राण) ही सर्वश्रेष्ठ है। 40॥   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.258.40 
वायुर्भीमो भीमनादो महौजा:
स सर्वेषां प्राणिनां प्राणभूत:।
नानावृत्तिर्देहिनां देहभेदे
तस्माद् वायुर्देवदेवो विशिष्ट:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
भयंकर शब्द करने वाला महान, शक्तिशाली और भयानक प्राणवायु ही समस्त प्राणियों का प्राण रूप है। प्राणियों के शरीर नष्ट हो जाने पर वे नाना प्रकार की योनियों या शरीरों को प्राप्त होते हैं। अतः इस शरीर के भीतर देवाधिदेव वायु (प्राण) ही सर्वश्रेष्ठ है। 40॥
 
The great, powerful and terrifying Praanavayu, who utters terrible words, is the life form of all living beings. After the destruction of the body of the living beings, they attain different types of forms or bodies. Therefore, within this body, Devadhideva Vayu (Pran) is the best. 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)