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mahabharat 12.258.34: हे मनुष्यों! जो आँसू मैंने पहले तुम्हारे मुँह से गिरते देखे थे और जिन्हें मैंने अपनी हथेलियों में थामा था, वे समय आने पर भयंकर रोग बन जाएँगे और लोगों को मृत्यु के मुँह में पहुँचा देंगे।   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.258.34 
यानश्रुबिन्दून् पतितानपश्यं
ये पाणिभ्यां धारितास्ते पुरस्तात्।
ते व्याधयो मानवान् घोररूपा:
प्राप्ते काले कालयिष्यन्ति मृत्यो॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों! जो आँसू मैंने पहले तुम्हारे मुँह से गिरते देखे थे और जिन्हें मैंने अपनी हथेलियों में थामा था, वे समय आने पर भयंकर रोग बन जाएँगे और लोगों को मृत्यु के मुँह में पहुँचा देंगे।
 
O mortals! The tears that I saw falling from you earlier and which I held in my hands, will turn into a dreadful disease when the time comes and will send people to the jaws of death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)