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mahabharat 12.258.22-23h: तत्पश्चात् वह महान ब्रह्मकन्या गंगाजी के तट पर जाकर मेरु पर्वत पर पहुँची और वहाँ वृक्ष के समान स्थिर होकर लोक-कल्याण की कामना करती हुई खड़ी रही। 22 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  12.258.22-23h 
ततो ययौ महाभागा गङ्गां मेरुं च केवलम्॥ २२॥
तस्थौ दार्विव निश्चेष्टा प्रजानां हितकाम्यया।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वह महान ब्रह्मकन्या गंगाजी के तट पर जाकर मेरु पर्वत पर पहुँची और वहाँ वृक्ष के समान स्थिर होकर लोक-कल्याण की कामना करती हुई खड़ी रही। 22 1/2॥
 
After that, that great Brahmakanya went to the banks of Ganga and only to Mount Meru. There she stood motionless like a tree, wishing for the welfare of the people. 22 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)