Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.258.1: नारदजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात बड़े-बड़े नेत्रों वाली वह असहाय स्त्री अपना दुःख स्वयं ही दूर कर झुकी हुई लता के समान विनम्र हो गई और हाथ जोड़कर ब्रह्माजी से बोली -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.258.1 
नारद उवाच
विनीय दु:खमबला साऽऽत्मनैवायतेक्षणा।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता तदा॥ १॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात बड़े-बड़े नेत्रों वाली वह असहाय स्त्री अपना दुःख स्वयं ही दूर कर झुकी हुई लता के समान विनम्र हो गई और हाथ जोड़कर ब्रह्माजी से बोली -॥1॥
 
Narada says, "O King! Thereafter that helpless lady with big eyes pushed aside her sorrow herself and became humble like a bowed creeper and with folded hands spoke to Brahmaji -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)