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mahabharat 12.257.7-8: ये समस्त जलाशय, समस्त घास-फूस, लताएँ तथा चारों प्रकार के जीव (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जलकर भस्म हो रहे हैं। सम्पूर्ण जगत का विनाश निकट है। प्रभु! प्रसन्न होइए। मुनियों! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ। 7-8॥   |   mahabharat अध्याय 12.257: महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 257: महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  12.257.7-8 
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोपलम्।
स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम्॥ ७॥
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत‍् सर्वमुपप्लुतम्।
प्रसीद भगवन् साधो वर एष वृतो मया॥ ८॥
 
 
अनुवाद
ये समस्त जलाशय, समस्त घास-फूस, लताएँ तथा चारों प्रकार के जीव (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जलकर भस्म हो रहे हैं। सम्पूर्ण जगत का विनाश निकट है। प्रभु! प्रसन्न होइए। मुनियों! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ। 7-8॥
 
All these reservoirs, all the grasses and creepers and the four types of living beings (Swedaj, Andaj, Udbhijja, Jarayuj) are being burnt to ashes. The destruction of the entire world is imminent. Lord! Be happy. Saints! I ask for this boon from you. 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)