श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 257: महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति  » 
 
 
अध्याय 257: महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति
 
श्लोक 1:  महादेवजी बोले- प्रभु! पितामह! मेरी इच्छा या उद्देश्य प्रजा की रक्षा के लिए आपसे प्रार्थना करना है। आपको यह जानना चाहिए। आपने ही इन प्रजाओं को उत्पन्न किया है, अतः आपको इन पर क्रोध नहीं करना चाहिए॥1॥
 
श्लोक 2:  हे देव! हे जगत के स्वामी! आज समस्त प्रजा आपके क्रोध की अग्नि में जल रही है। उन्हें उस दशा में देखकर मुझे दया आ रही है, कृपया आप उन पर क्रोध न करें॥ 2॥
 
श्लोक 3:  प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा- शिवे! मैं प्रजा पर क्रोधित नहीं हूँ, न ही मैं चाहता हूँ कि प्रजा का विनाश हो। पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए ही प्रजा का विनाश आवश्यक प्रतीत होता है।
 
श्लोक 4:  महादेव! भारी बोझ से दबी यह धरती माता मुझे सदैव प्रजा का नाश करने के लिए उकसाती रही है; क्योंकि यह संसार के भार से समुद्र में डूब रही है।
 
श्लोक 5:  जब बहुत सोचने पर भी मैं इस बढ़ी हुई जनसंख्या को मारने का कोई उपाय न पा सका, तब मुझे क्रोध आ गया ॥5॥
 
श्लोक 6:  महादेवजी बोले- हे प्रभु! विनाश के लिए क्रोधित न हों। प्रजा पर प्रसन्न रहें। ऐसा हो कि सभी सजीव और निर्जीव प्राणी नष्ट हो जाएँ।
 
श्लोक 7-8:  ये समस्त जलाशय, समस्त घास-फूस, लताएँ तथा चारों प्रकार के जीव (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जलकर भस्म हो रहे हैं। सम्पूर्ण जगत का विनाश निकट है। प्रभु! प्रसन्न होइए। मुनियों! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ। 7-8॥
 
श्लोक 9:  यदि ये लोग नष्ट हो जाएँ, तो किसी भी स्थिति में पुनः यहाँ प्रकट नहीं हो सकेंगे। अतः आप कृपा करके अपनी शक्ति से इस क्रोधाग्नि को बुझा दीजिए॥9॥
 
श्लोक 10:  पितामह! समस्त जीवों के हित के लिए कृपया विनाश का कोई अन्य उपाय सोचिए, जिससे ये सभी जीव एक साथ जलकर राख न हो जाएँ।
 
श्लोक 11:  हे लोकेश्वर! आपने मुझे देवताओं का अधिपति नियुक्त किया है। अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि यदि प्रजा की संतान नष्ट हो जाए, तो प्रजा का सर्वथा अभाव हो जाएगा; अतः आप इस विनाश को रोकें।
 
श्लोक 12:  जगन्नाथ! हे महादेव! यह सम्पूर्ण चर-अचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि ये सभी प्राणी पुनः जन्म लें - मरकर पुनः जन्म लें॥ 12॥
 
श्लोक 13:  नारदजी बोले - राजन! महादेवजी के ये वचन सुनकर ब्रह्माजी ने अपने मन और वाणी को वश में करके उस अग्नि को पुनः अपने अन्तःकरण में लीन कर लिया॥13॥
 
श्लोक 14:  तब प्रजाजनों द्वारा पूजित भगवान ब्रह्मा ने उस अग्नि को समाप्त करके प्रजाजनों के लिए जन्म-मरण की व्यवस्था की ॥14॥
 
श्लोक 15:  क्रोध की अग्नि को बुझाते समय महात्मा ब्रह्माजी की समस्त इन्द्रियों से एक स्त्री के समान मूर्ति प्रकट हुई॥15॥
 
श्लोक 16:  उसके वस्त्र काले और लाल थे। उसकी आँखों का निचला और भीतरी भाग भी काले रंग का था। वह दिव्य कुण्डलों से दैदीप्यमान थी और अलौकिक आभूषणों से सुसज्जित थी।
 
श्लोक 17:  वह ब्रह्मा के इन्द्रिय छिद्रों से निकलकर दक्षिण दिशा की ओर चली गई। उस समय दोनों जगदीश्वरों (ब्रह्मा और शिव) ने उस कन्या को देखा।
 
श्लोक 18:  हे राजन! तब लोकों के मूल कारण भगवान ब्रह्मा ने उसे 'मृत्यु' कहकर अपने पास बुलाया और कहा - 'तुम समय-समय पर इन लोगों का विनाश करते रहो॥ 18॥
 
श्लोक 19:  मैंने क्रोधपूर्वक और प्रजाजनों के वध की इच्छा से तुम्हारा चिन्तन किया था; अतः तुम मूर्खों और विद्वानों सहित समस्त प्रजाजनों का वध कर डालो॥19॥
 
श्लोक 20:  कामिनी! तुम मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण प्रजा का संहार करो। इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा। 20॥
 
श्लोक 21:  ब्रह्मा के वचन सुनकर कमल की माला से सुशोभित युवा देवी मृत्यु दुःखी हो गईं और अत्यन्त चिन्तित होकर आंसू बहाने लगीं।
 
श्लोक 22:  तब ब्रह्मा जी ने मनुष्यों के कल्याण के लिए मृत्यु के आंसू अपने दोनों हाथों में ले लिए और मृत्यु ने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)