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mahabharat 12.254.4: लोभी मनुष्य लोहे की जंजीरों के समान काम के बंधनों में बँधे हुए इस महान फलदार वृक्ष को चारों ओर से घेरकर इसके फल प्राप्त करने की इच्छा से इसके चारों ओर बैठे हैं ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.254.4 
उपासते महावृक्षं सुलुब्धास्तत्फलेप्सव:।
आयसै: संयुता: पाशै: फलदं परिवेष्टॺ तम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
लोभी मनुष्य लोहे की जंजीरों के समान काम के बंधनों में बँधे हुए इस महान फलदार वृक्ष को चारों ओर से घेरकर इसके फल प्राप्त करने की इच्छा से इसके चारों ओर बैठे हैं ॥4॥
 
Greedy people, bound in the shackles of desire like iron chains, have surrounded this great fruit-bearing tree from all sides and are sitting around it, wanting to obtain its fruits. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)