Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.254.13: मन भी उसी वस्तु का आश्रय लेता है जिसका बुद्धि आश्रय लेती है। जब मन बुद्धि से अलग हो जाता है, तब केवल मन ही शेष रह जाता है॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.254.13 
यदर्थं पृथगध्यास्ते मनस्तत्परिषीदति।
पृथग्भूतं मनो बुद्धॺा मनो भवति केवलम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मन भी उसी वस्तु का आश्रय लेता है जिसका बुद्धि आश्रय लेती है। जब मन बुद्धि से अलग हो जाता है, तब केवल मन ही शेष रह जाता है॥13॥
 
The mind also takes shelter of the same thing which the intellect supports. When the mind is separated from the intellect, only the mind remains.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)