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mahabharat 12.254.11: रजोगुण और तमोगुण - ये दोनों विकार निषिद्ध मार्ग से उस विषय-भोग में आश्रय लेते हैं। वहाँ बुद्धि, कठिन होने पर भी, मन के साथ रहकर उसके समान हो जाती है ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.254.11 
अद्वारेण तमेवार्थं द्वौ दोषावुपजीवत:।
तत्र बुद्धिर्हि दुर्धर्षा मन: सामान्यमश्नुते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
रजोगुण और तमोगुण - ये दोनों विकार निषिद्ध मार्ग से उस विषय-भोग में आश्रय लेते हैं। वहाँ बुद्धि, कठिन होने पर भी, मन के साथ रहकर उसके समान हो जाती है ॥11॥
 
Rajoguna and Tamoguna – these two vices take refuge in that sensual pleasure through the forbidden path. There the intellect, even when it is difficult, becomes like it by being with the mind. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)