Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.254.1-2: व्यासजी कहते हैं - बेटा! मनुष्य के हृदय में आसक्ति रूपी बीज से उत्पन्न एक विचित्र वृक्ष है, जिसका नाम काम है। क्रोध और मद उसकी बड़ी शाखाएँ हैं। कुछ करने की इच्छा ही उसे सींचने का पात्र है। अज्ञान ही उसकी जड़ है। प्रमाद ही उसे सींचने वाला जल है। दूसरों के दोष देखना उस वृक्ष का पत्ता है और पूर्वजन्म में किए हुए पाप ही उसका सार हैं॥1-2॥ | mahabharat अध्याय 12.254: कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और शरीररूपी नगरका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
व्यास उवाच
हृदि कामद्रुमश्चित्रो मोहसंचयसम्भव:।
क्रोधमानमहास्कन्धो विधित्सापरिषेचन:॥ १॥
तस्य चाज्ञानमाधार: प्रमाद: परिषेचनम्।
सोऽभ्यसूयापलाशो हि पुरा दुष्कृतसारवान्॥ २॥
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं - बेटा! मनुष्य के हृदय में आसक्ति रूपी बीज से उत्पन्न एक विचित्र वृक्ष है, जिसका नाम काम है। क्रोध और मद उसकी बड़ी शाखाएँ हैं। कुछ करने की इच्छा ही उसे सींचने का पात्र है। अज्ञान ही उसकी जड़ है। प्रमाद ही उसे सींचने वाला जल है। दूसरों के दोष देखना उस वृक्ष का पत्ता है और पूर्वजन्म में किए हुए पाप ही उसका सार हैं॥1-2॥
Vyasji says - Son! There is a strange tree in the heart of a human being that has grown from the seed of attachment, whose name is lust. Anger and pride are its great branches. The desire to do something is the vessel to water it. Ignorance is its root. Negligence is the water that waters it. Seeing the faults of others is the leaf of that tree and the sins committed in the previous birth are its essence.॥ 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥