श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 253: स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  12.253.5-6 
स्वपतां जाग्रतां चैष सर्वेषामात्मचिन्तितम्।
प्रधानाद्वैधमुक्तानां जहतां कर्मजं रज:॥ ५॥
यथाहनि तथा रात्रौ यथा रात्रौ तथाहनि।
वशे तिष्ठति सत्त्वात्मा सततं योगयोगिनाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग योगबल से अपने मन में कर्मजन्य रजोगुण को अर्थात् रजोगुण से उत्पन्न वासना को त्याग देते हैं और जो प्रकृति के साथ तादात्म्य भाव से भी मुक्त हैं, उन योगनिष्ठ समस्त योगियों का आत्मा दिन में भी, रात्रि में भी, रात्रि में भी, दिन में भी, सोते-जागते निरन्तर उनके वश में रहता है। 5-6॥
 
Those who, through the power of yoga, give up in their mind the karma-borne Rajogun, i.e., the lust caused by the Rajogun, and who are also free from the sense of identification with nature, the soul of all those yogis who are devoted to yoga, as in the day, as in the night, as in the night, as in the day, is constantly under their control while sleeping and waking up. 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)