श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 253: स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.253.3 
प्रतिरूपं यथैवाप्सु ताप: सूर्यस्य लक्ष्यते।
सत्त्ववत्सु तथा सत्त्वं प्रतिरूपं स पश्यति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जैसे सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न जलाशयों के जल में पृथक-पृथक दिखाई देती हैं, वैसे ही योगी समस्त जीव-शरीरों के भीतर सूक्ष्म रूप में स्थित पृथक-पृथक जीवों को देखता है ॥3॥
 
Just as the sun's rays are seen separately in the water of different reservoirs, in the same way a yogi sees the separate living beings present in the subtle form within all the living bodies. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)